अफसरों के दिलों में रोशन है हिंदी का प्रेम दीप – Patna News

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विश्व हिंदी दिवस पर हिंदी की आत्मा, उसकी शुद्धता और उसकी सांस्कृतिक ताकत पर जब देश के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी बोलते हैं, तो बात केवल भाषा की नहीं, बल्कि सोच और संस्कार की हो जाती है। बिहार के डीआईजी, विधिक मामले सुशील कुमार, मुजफ्फरपुर एसएसपी कांतेश मि

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अधिकारियों का मानना है कि आज की “नई हिंदी” में चमक-दमक जरूर है, लेकिन “मूल हिंदी” की मिठास, शुद्धता और संस्कार को बचाए रखना हम सबकी जिम्मेदारी है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे हिंदी के साथ-साथ अपनी क्षेत्रीय भाषाओं से भी जुड़ें, क्योंकि ये भाषाएं हीं हमारी असली पहचान हैं। विश्व हिंदी दिवस पर यह संदेश साफ है कि हिंदी केवल बोलने की नहीं, जीने की भाषा है। इसे आधुनिक बनाइए, तकनीक से जोड़िए, लेकिन इसकी जड़ों को मत भूलिए, क्योंकि जड़ें मजबूत होंगी तभी भाषा और संस्कृति का पेड़ हरा-भरा रहेगा।

अफसरों के दिलों में रोशन है हिंदी का प्रेम दीप - Patna News

जहां हिंदी के सुंदर शब्द हों, वहां अंग्रेजी नहीं थोपें : विनय

बच्चों को शुरू से ही शुद्ध हिंदी सिखाना जरूरी: कांतेश

भाषा समय के साथ विकसित होती रहती है : सुशील कुमार

वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी विनय ओम तिवारी ने हिंदी को केवल बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि चेतना और पहचान की भाषा बताया। उन्होंने कहा कि हिंदी हमें देश से जोड़ती है और क्षेत्रीय भाषाएं हमें अपनी मिट्टी से। विदेशी शब्दों का जरूरत के अनुसार इस्तेमाल ठीक है, लेकिन जहां सुंदर हिंदी शब्द मौजूद हों, वहां अंग्रेजी थोपना हमारी भाषाई कमजोरी दिखाता है। उनके अनुसार अच्छा साहित्य मन को मजबूत करता है, तनाव और नकारात्मकता को दूर करता है और जीवन को सही दिशा देता है। लेखन तभी सार्थक है, जब लेखक के विचार, वाणी और आचरण एक हों।

आईपीएस कांतेश कुमार मिश्रा न सिर्फ सख्त प्रशासनिक अधिकारी हैं, बल्कि दिल से कवि भी हैं। प्रकृति, गांव, शहर और जीवन दर्शन उनकी कविताओं में ऐसे बहते हैं, जैसे गंगा की धारा। उनके तीन कविता संग्रह ‘इंद्रप्रस्थ के काश पुष्प’, ‘मगध सा मन’ और ‘पाटलिपुत्र के छांव से’ और बच्चों की कहानियों की एक पुस्तक प्रकाशित हो चुके हैं। वे कहते हैं कि भाषा समय के साथ बदलती है, यह स्वाभाविक है, लेकिन उसकी आत्मा और व्याकरण की शुद्धता बनी रहनी चाहिए। बच्चों को शुरू से ही अच्छी, शुद्ध और संस्कारयुक्त हिंदी सिखाना जरूरी है।

डीआईजी विधिक मामले एवं नियम सुशील कुमार ने कहा कि हिंदी को नई और पुरानी में बांटना सही नहीं है। भाषा समय के साथ विकसित होती है और दूसरी भाषाओं व स्थानीय बोलियों से शब्द ग्रहण कर सशक्त बनती है। उन्होंने कहा कि नई हिंदी दरअसल एक व्यावसायिक स्लोगन है, जबकि वास्तविकता में हिंदी निरंतर समृद्ध हो रही है। अंग्रेजी की तरह ही हिंदी भी विभिन्न भाषाओं से शब्द लेकर आगे बढ़ रही है। डीआईजी सुशील का लेखन समाज और आम लोगों की भावनाओं से जुड़ा है। उनकी पुस्तक साइबर कथाएं शीर्षक से राजकमल प्रकाशन से जल्द ही आने वाली है।

विश्व हिंदी दिवस



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