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जगह- झारखंड के रामगढ़ जिले का बरलंगा-नेमरा रोड।
पेशे से शिक्षक सोबरन सोरेन गोला के सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले अपने बेटे के लिए घर से सामान ले जा रहे थे। गोला पहुंचने से पहले बरलंगा में ही उनकी हत्या कर दी गई। कारण था – महाजनों के खिलाफ लोगों को जागरूक करना।
तब गोला के प्लस-2 उच्च विद्यालय में 9वीं कक्षा में पढ़ाई कर रहा 13 साल का उनका बेटा उसी वक्त पढ़ाई छोड़ अपने पिता के शव के पास पहुंचा। लौट के दोबारा स्कूल नहीं आया। जुट गया अपने पिता की मुहिम को मुकाम तक पहुंचाने में।
ऐसा आंदोलन छेड़ा कि न केवल महाजनों की पूरी दुकान बंद हुई, बल्कि उन्हें इलाके छोड़कर जाना पड़ा। महाजनों के खिलाफ शुरू हुई ये लड़ाई झारखंड को अलग राज्य बनाने तक पहुंच गई और इस आंदोलन को तेज करने वाला शख्स कोई और नहीं दिशोम गुरु शिबू सोरेन थे।
शिबू सोरेन अब नहीं रहे। जिस नेमरा गांव में जन्म लिए उसी गांव के घाट पर उन्हें अंतिम विदाई दी गई। उन्हें अंतिम विदाई देने देश के दिग्गज नेता से लेकर गांव-गांव से लोग जुटे। उन्हें चिता पर जलता देख हर किसी की आंखें नम थी। जुवां पर बस एक ही अल्फाज थे वीर शिबू सोरेन अमर रहे।
ऐसे में भास्कर हर उस जगह पहुंचा, जहां से कभी शिबू सोरेन ने अपने जीवन, आंदोलन और राजनीति की शुरुआत की थी। स्पेशल रिपोर्ट में पढ़िए, शिबू सोरेन के अनसुने किस्से…
शिबू सोरेन के परिजनों ने बताया, ‘वे अब भी जब अपने गांव आते थे तो खटिया पर ही सोते थे।’ अब जब वह आखिरी बार नेमरा पहुंचे तो उन्हें उसी खाट पर लिटा कर गांव होते हुए घाट तक लाया गया। यहां खाट से उतार कर उन्हें चिता पर लिटाया गया इसके बाद मुखाग्नि दी गई।
नहीं बदला शिबू सोरेन का भंसा घर, आज भी झोपड़ी, मिट्टी का चूल्हा
95 आदिवासी घरों वाले नेमरा गांव में शिबू सोरेन का इकलौता मकान है, जो दो मंजिला है, जिसके भीतर आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर हैं। लेकिन इस मकान के ठीक भीतर फूस की छत का बना एक भंसा घर भी है। इसके भीतर मिट्टी के चूल्हे, शिल-बट्टा (मसाला पीसने वाला पत्थर) और जांता भी है। जब हम (भास्कर रिपोर्टर) इस भंसा घर में जाने लगे तो हमारे जूते उतार लिए गए। बताया गया कि इस घर में जूते-चप्पल पहन कर नहीं आ सकते हैं।
इस घर में रहने वाली शिबू सोरेन की भतीजी रेखा सोरेन ने बताया, ‘इसी मिट्टी के चूल्हे पर शुरू से ही खाना बनता रहा है। शिबू सोरेन के जन्म से ही ये चूल्हा है। इसमें कोई बदलाव नहीं किया गया है। सब कुछ बदला, लेकिन ये नहीं बदला। इसे उन्होंने कभी बदलने भी नहीं दिया। उन्हें पसंद था कि उनके घर का चूल्हा ऐसा ही रहे। वे कहते थे कि ये हमारी परंपरा है इसलिए ये ऐसा ही रहे। अब इस किचन में बस उनकी यादें हैं।’
जब भी शिबू सोरेन गांव आते थे, उनके लिए मिट्टी के चूल्हे पर ही खाना बनता था। यह चूल्हा आज भी उनके घर में है।
जिस गांव में पिता की हत्या हुई, वहां महाजनों के घर में अब दीया तक नहीं जलता
उनके गांव नेमरा से तकरीबन 6 KM दूर है बरलंगा बस्ती। नवंबर 1957 में यहीं उनके पिता सोबरन मांझी की हत्या महाजनों (हरिभजन साव और फोकन साव) ने कर दी थी। यहां उनके नाम का एक शहीद स्थल बना दिया गया है, जहां उनकी प्रतिमा स्थापित है।
यहां हमारी मुलाकात 70 साल के अनिल महतो से हुई। उन्होंने बताया, ‘आज भी हर साल 27 नवंबर को सीएम हेमंत सोरेन यहां आते हैं। वे अपने दादाजी के इस शहीद स्थल पर माल्यार्पण करते हैं।’
अनिल महतो बताते हैं, ‘शिबू सोरेन ने अपने पिता की हत्या के बाद इस इलाके के पूरे महाजनों से जमीन छीन ली। जिन-जिन लोगों की जमीन थी सभी को उन्हें वापस दिलाया। नगाड़ा बजा-बजा कर जमीन कर कब्जा किए। महाजनों को मजबूर होकर भागना पड़ा। आज आलम यह है कि यहां एक भी महाजन नहीं बचे। उनका नाम लेने वाला तक कोई नहीं है। बड़े-बड़े घर तो हैं, लेकिन उस घर में दीया जलाने वाला कोई नहीं है।’

दिवंगत शिबू सोरेन के पिता की समाधि बरलंगा गोला में बनाई गई है। यहां हर साल मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आते हैं और माल्यार्पण करते हैं।
पिता के हत्यारे को आज तक सजा नहीं दिला पाए
शिबू सोरेन के पिता के हत्यारों को अभी तक सजा नहीं हो पाई है। इस घटना को आज तकरीब 68 साल हो गए, लेकिन हत्यारा कौन था इसकी पहचान अभी तक नहीं हो पाई। 15 साल की उम्र से शिबू सोरेन के साथ रहने वाले ईश्वर महतो बताते हैं, ‘पिता की हत्या करने वाले किसी भी व्यक्ति को अभी तक सजा नहीं हुई है। सबूत मिलता तब न सजा होती। आज तक सबूत ही नहीं मिला तो सजा कैसे होती।’
कांग्रेस सरकार ने उग्रवादी घोषित किया था, जंगल में छुपे रहते थे
रामगढ़ के मांडू के रहने वाले 75 वर्षीय ईश्वर महतो 15 साल की उम्र में ही शिबू सोरेन से जुड़ गए थे। ईश्वर महतो ने बताया, ‘महाजनों ने गुरुजी के पिता की हत्या करा दी थी। इसके बाद उन्होंने हमलोगों को साथ देने की अपील की। उन्होंने कहा कि महाजन हमारी जमीन पर कब्जा कर रहे हैं, धान छीन कर ले जा रहे हैं। अब हम अपने लोगों को जागरुक करेंगे। वे पढ़ाई छोड़कर गांव-गांव जाकर संगठन बनाने लगे। सभी को बताने लगे कि जगह-जमीन सबकुछ हमलोग वापस कराएंगे।’

राज्य अलग होने के बाद गुरुजी ने शादी कराई
60 साल के शनिचरा मांझी ने बताया, ‘हम शिबू सोरेन के कमांडर हैं। उन्होंने ही मुझे कमांडर बनाकर रखा। बचपन में ही मैंने अपने माता-पिता को खो दिया था। तेनुघाट डैम के किनारे हम गुरुजी से मिले थे तब से उन्हीं को अपना मां-बाप मान लिए थे।’
शनिचर मांझी कहते हैं, ‘12-13 साल की उम्र में ही गुरुजी से जुड़ गए थे। गुरुजी ने हमलोगों को वचन दिया था कि झारखंड अलग होगा। तभी मैंने गुरुजी के सामने वचन लिया था कि जब तक झारखंड अलग नहीं होगा तब तक शादी नहीं करेंगे। राज्य अलग होने के बाद गुरुजी ने खुद मेरी शादी कराई थी।’

दिवंगत शिबू सोरेन जब भी अपने गांव वाले घर आते थे, वह इसी खटिया (चारपाई) पर सोते थे। अंतिम यात्रा के दौरान भी उनको इसी खटिया पर सुलाया गया।
‘हमलोग मैथन डैम, तेनुघाट डैम, पहाड़ पर छुप- छुप कर रहते थे। जब हमारे ठिकाने की जानकारी किसी को मिल जाती थी तब हम वहां से भागकर दूसरी जगह छिप जाते थे। जब झारखंड राज्य अलग हुआ था, तब ऐसा नहीं हुआ कि वे हमलोगों को भूल गए। इसके बाद वे हमलोगों के बीच आते रहे। उन्होंने सबको बुला-बुला कर पार्टी और संगठन में पद दिलाया। किसी को जिला अध्क्षयक्ष तो किसी को प्रदेश में भी पद दिलाया।’
आखिर में शनिचरा मांझी भावुक हो गए। कहते हैं, ‘दिल्ली में मुलाकात नहीं हो पाई। हर 10 दिन में एक बार जरूर मिल लेते थे, लेकिन आखिरी समय में नहीं मिल पाया। उन्होंने मुझे बेटे की तरह पाला। मुझे जीना सीखाया, लेकिन आखिरी मुलाकात से हम दूर रह गए।’
संघर्ष के दिनों में महुआ का लट्ठाठा खाकर गुजारा करते थे शिबू सोरेन
फुलचंद रजवार ने 6 महीने तक शिबू सोरेन को खाना बनाकर खिलाया है। वे बताते हैं, ‘शिबू सोरेन को खाने में मड़भत्ता, कुर्थी के दाल, मुंगा साग, महुआ का लट्ठा बहुत पसंद था। जंगल-झाड़ में जो कुछ मिलता था, वही सब बनाकर हमलोग उन्हें देते थे। आश्रम में टूटे खटिया पर सोते थे।’

धनबाद के टुंडी में आश्रम में आज भी उनका कमरा है
65 साल के किस्टो बेसरा 1972 से शिबू सोरेन से जुड़े थे। धनबाद के टुंडी के पोखरिया में जब शिबू सोरेन आए थे, तब यहीं उनकी मुलाकात हुई थी। वे बताते हैं, ‘जहां वे रहते थे उसे हमलोगों ने शिबू आश्रम नाम दे दिया। ये आश्रम आज भी है। जिस खटिया पर सोते थे, जिस कमरे में वो रहते थे सबकुछ वैसा ही है। हालांकि, 15 साल से शिबू सोरेन वहां नहीं गए हैं।’
किस्टो बेसरा बताते हैं, ‘यहां रहकर गुरुजी ने महाजनों से जमीन वापस कराया। वे हमलोगों के साथ यहां खेती करते थे। हमलोगों के साथ खेत में हल चलाते थे। खेती के तरकीब बताते थे। वे हमेशा हमलोगों को शराब पीने से रोकते थे। बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित करते थे। गुरुजी हमलोग को छोड़कर चले गए।’

शिबू सोरेने के कारण बरलंगा से सूदखोरी समाप्त हो गई
बरलंगा के 74 वर्षीय बेनादर प्रसाद साहू ने बताया, ‘जब शिबू सोरेन बलंगा पंचायत से पहली बार चुनाव लड़े थे तब वे स्टूडेंट्स थे। तब लोग शिबू सोरेन को समझ नहीं पाए। पंचायत बहुत बड़ा था। लोग समझ नहीं पाए। उन्होंने सूदखोरी और महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन भी उन्होंने यहीं से शुरू की। सभा कर लोगों को जागरुक किया। आज के समय में वो यहां से कोई चुनाव लड़ते तो उनके आसपास कोई नहीं टिकता। वे हमारे घर का बेटा थे। वे नौकरी से ज्यादा मजदूरी पर फोकस करने के लिए कहते थे।